बदलती वैश्विक व्यवस्था और भारत–फ्रांस साझेदारी पर पेरिस में डॉ. एस. जयशंकर का अहम संबोधन

बदलती वैश्विक व्यवस्था और भारत–फ्रांस साझेदारी पेरिस में डॉ. एस. जयशंकर का अहम संबोधन 

By Aman Srivastava | Updated: 10 January 2026 | Source: International Affairs Desk

Dr S Jaishankar Paris France Ambassadors Conference India France Relations

वैश्विक राजनीति इस समय तेज़ बदलाव के दौर से गुजर रही है। शक्ति संतुलन, आर्थिक ढांचे, तकनीकी प्रभुत्व और कूटनीतिक प्राथमिकताओं में हो रहे परिवर्तन अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को नए सिरे से परिभाषित कर रहे हैं।

ऐसे समय में भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर का पेरिस में फ्रांस के Ambassadors’ Conference को संबोधित करना न केवल प्रतीकात्मक, बल्कि रणनीतिक रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

संबोधन के प्रमुख बिंदु:
✔ बदलती वैश्विक व्यवस्था का विश्लेषण
✔ बहुध्रुवीय विश्व की आवश्यकता
✔ रणनीतिक स्वायत्तता पर ज़ोर
✔ भारत–फ्रांस साझेदारी की भूमिका

वैश्विक बदलावों की पृष्ठभूमि

अपने संबोधन में डॉ. जयशंकर ने कहा कि आज के दौर में वैश्विक बदलाव किसी एक कारण से नहीं, बल्कि कई आपस में जुड़े कारकों से संचालित हो रहे हैं।

  • व्यापार और वित्त अब केवल आर्थिक गतिविधियां नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक हथियार बन चुके हैं
  • प्रौद्योगिकी — खासकर AI, सेमीकंडक्टर्स और डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर — ने प्रतिस्पर्धा को नया रूप दिया है
  • ऊर्जा और संसाधन सुरक्षा अब राष्ट्रीय सुरक्षा का अहम हिस्सा है
  • कनेक्टिविटी ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को पुनर्परिभाषित किया है

डॉ. जयशंकर के अनुसार, इन सभी परिवर्तनों के केंद्र में सोच में बदलाव (Change in Mindset) सबसे निर्णायक तत्व है।

बहुध्रुवीय विश्व की ओर बढ़ता संसार

डॉ. जयशंकर ने अपने भाषण में बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था (Multipolar World Order) को वर्तमान समय की अनिवार्यता बताया।

उन्होंने कहा कि अब दुनिया किसी एक शक्ति केंद्र पर आधारित नहीं रह सकती। उभरती अर्थव्यवस्थाएं, क्षेत्रीय शक्तियां और मध्यम आकार के देश वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में पहले से अधिक सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

रणनीतिक स्वायत्तता: भारत की कूटनीति का आधार

डॉ. जयशंकर ने Strategic Autonomy को भारत की विदेश नीति का मूल आधार बताया।

इसका अर्थ है—किसी एक शक्ति गुट पर निर्भर न रहकर, राष्ट्रीय हितों के अनुसार स्वतंत्र निर्णय लेना। यही नीति भारत को अमेरिका, यूरोप, रूस, अफ्रीका और एशिया—सभी के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने में सक्षम बनाती है।

भारत–फ्रांस साझेदारी का महत्व

अपने संबोधन में डॉ. जयशंकर ने भारत–फ्रांस संबंधों को एक भरोसेमंद और दूरदर्शी रणनीतिक साझेदारी के रूप में प्रस्तुत किया।

यह सहयोग केवल रक्षा या व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें शामिल हैं:

  • जलवायु परिवर्तन
  • इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की स्थिरता
  • अंतरिक्ष और परमाणु ऊर्जा
  • वैश्विक शासन सुधार

फ्रांस उन यूरोपीय देशों में अग्रणी है, जो भारत को एक दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदार के रूप में देखते हैं।

यूरोप के साथ भारत की बदलती भूमिका

पेरिस में दिया गया यह संबोधन इस बात का संकेत है कि भारत अब यूरोप के साथ अपने संबंधों को नई गहराई दे रहा है।

जहां पहले रिश्ते मुख्यतः आर्थिक थे, वहीं अब वे रणनीतिक और वैचारिक साझेदारी में बदल रहे हैं। इस बदलाव में फ्रांस भारत का प्रमुख सहयोगी बनकर उभरा है।

वैश्विक कूटनीति में भारत की छवि

डॉ. एस. जयशंकर का यह संबोधन भारत की उस छवि को मजबूत करता है, जिसमें वह:

  • एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति
  • संवाद और संतुलन का समर्थक
  • विकासशील देशों की आवाज़
  • नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का पक्षधर

पेरिस में फ्रांस के राजदूत सम्मेलन को संबोधित करते हुए डॉ. एस. जयशंकर ने न केवल बदलती वैश्विक वास्तविकताओं का विश्लेषण किया, बल्कि भारत की वैश्विक भूमिका को भी स्पष्ट रूप से परिभाषित किया।

उनका संदेश साफ था—आज की दुनिया में शक्ति केवल सैन्य या आर्थिक नहीं, बल्कि दृष्टिकोण, साझेदारी और रणनीतिक सोच से तय होती है।

भारत–फ्रांस साझेदारी इसी सोच का प्रतीक है और आने वाले समय में यह वैश्विक स्थिरता तथा बहुध्रुवीय व्यवस्था को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

Aaworlds – जहाँ वैश्विक घटनाओं की समझ मिलती है भरोसे के साथ।

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