आज के दौर में बहुत से लोग यह महसूस करते हैं कि संबंध बनाने की इच्छा बार-बार मन में क्यों आती है। कभी अकेलेपन में, कभी किसी की बातों से जुड़ाव महसूस होकर, तो कभी बिना किसी स्पष्ट कारण के ही दिल किसी रिश्ते की ओर खिंचने लगता है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार यह भावना पूरी तरह स्वाभाविक है।
इंसान की मूल प्रवृत्ति है संबंध बनाना
मनुष्य को सामाजिक प्राणी कहा जाता है। उसे अपने विचार साझा करने, भावनाएं व्यक्त करने और किसी के साथ जुड़ाव महसूस करने की आवश्यकता होती है। जब यह जरूरत पूरी नहीं होती, तो मन बार-बार नए संबंध की तलाश करता है।
अकेलापन और भावनात्मक कमी
आज भले ही लोग सोशल मीडिया से जुड़े हों, लेकिन असल जीवन में भावनात्मक जुड़ाव की कमी बढ़ती जा रही है। परिवार से दूरी, व्यस्त जीवन और भरोसेमंद व्यक्ति का अभाव मन में खालीपन पैदा करता है। यही खालीपन संबंध बनाने की चाह को बार-बार जन्म देता है।
दिमाग और हार्मोन की भूमिका
वैज्ञानिक रूप से देखा जाए तो ऑक्सीटोसिन और डोपामिन जैसे हार्मोन रिश्तों से जुड़ाव में अहम भूमिका निभाते हैं। जब किसी से बात करके अच्छा महसूस होता है, तो दिमाग उसी अनुभव को दोहराना चाहता है। यही वजह है कि इंसान फिर से किसी रिश्ते की ओर आकर्षित होता है।
फिल्में और सोशल मीडिया का असर
फिल्मों, वेब सीरीज़ और सोशल मीडिया पर रिश्तों को अक्सर बेहद खूबसूरत और परफेक्ट दिखाया जाता है। इससे लोगों की उम्मीदें बढ़ जाती हैं और मन वैसा ही रिश्ता चाहने लगता है। यह सामाजिक प्रभाव भी संबंध बनाने की इच्छा को बढ़ाता है।
खुद को खास महसूस करने की चाह
हर इंसान चाहता है कि कोई उसे समझे, उसकी बात सुने और उसे महत्व दे। जब कोई व्यक्ति हमें समय देता है, तो आत्म-सम्मान बढ़ता है। यही भावना बार-बार संबंध बनाने की इच्छा को मजबूत करती है।
क्या यह गलत है?
विशेषज्ञों के अनुसार, संबंध बनाने की चाह गलत नहीं है। लेकिन यह जरूरी है कि रिश्ता मजबूरी या डर से नहीं, बल्कि समझ, सम्मान और संतुलन पर आधारित हो।
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संबंध बनाने का मन बार-बार करना इंसानी स्वभाव का हिस्सा है। यह अपनापन, सुरक्षा और भावनात्मक जुड़ाव की जरूरत को दर्शाता है। अगर इंसान खुद को समझे और संतुलन बनाए रखे, तो वही संबंध जीवन को सुकून और मजबूती दे सकता है।