अरुणाचल प्रदेश: अवैध घुसपैठ के खिलाफ उबाल सड़कों पर उतरा स्थानीय युवा
अरुणाचल प्रदेश, जिसे अपनी शांति और प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है, इन दिनों एक गंभीर सामाजिक और रानीतिक उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है। राज्य की राजधानी ईटानगर और आसपास के इलाकों में 'अवैध घुसपैठियों' (Illegal Immigrants) के खिलाफ विरोध की आग फिर से भड़क उठी है स्थानीय छात्र संगठनों और युवा समूहों ने राज्य की जनसांख्यिकी (Demography) और स्वदेशी पहचान को बचाने के लिए एक आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है।
हालिया घटनाक्रम: 12 घंटे का 'बंद' और तनाव दिसंबर 2025 के दूसरे सप्ताह में (विशेषकर 9 दिसंबर को) ईटानगर राजधानी क्षेत्र में एक बड़ा विरोध प्रदर्शन देखा गया तीन प्रमुख युवा संगठनों ने 12 घंटे के 'बंद'(Bandh) का आह्वान किया था, जिसने सामान्य जनजीवन को पूरी तरह ठप कर दिया बाजार, स्कूल और सरकारी दफ्तर बंद रहे और सड़कों पर सन्नाटा पसरा रहा।
यह विरोध प्रदर्शन मुख्य रूप से तीन संगठनों द्वारा आयोजित किया गया था:
अरुणाचल प्रदेश इंडिजिनस यूथ ऑर्गेनाइजेशन (APIYO)
इंडिजिनस यूथ फोर्स ऑफ अरुणाचल (IYFA)
ऑल नाहरलगुन यूथ ऑर्गेनाइजेशन (ANYO)
इसके अलावा, राज्य का सबसे प्रभावशाली छात्र संगठन AAPSU (ऑल अरुणाचल प्रदेश स्टूडेंट्स यूनियन) भी लंबे समय से इस मुद्दे पर मुखर रहा है और सरकार पर कड़े कदम उठाने का दबाव बना रहा है विरोध के मुख्य कारण प्रदर्शनकारी संगठनों का कहना है कि यह लड़ाई किसी धर्म विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि राज्य के अस्तित्व को बचाने के लिए है। उनकी प्रमुख चिंताएं और मांगें निम्नलिखित हैं:
इनर लाइन परमिट (ILP) का उल्लंघन: प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि बाहरी राज्यों और पड़ोसी देशों (विशेषकर बांग्लादेश और म्यांमार) से लोग बिना वैध परमिट के राज्य में घुस रहे हैं और वहीं बस रहे हैं बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर रेगुलेशन (BEFR), 1873 के तहत अरुणाचल में बाहरी लोगों के प्रवेश के लिए ILP अनिवार्य है।
अवैध धार्मिक ढांचे: विरोध का एक बड़ा कारण ईटानगर और नाहरलगुन में कथित रूप से अवैध रूप से बनाए गए धार्मिक स्थल (जैसे मस्जिदें और अन्य ढांचे) हैं संगठनों का दावा है कि ये ढांचे सरकारी जमीन पर बिना अनुमति के बनाए गए हैं और इन्हें तुरंत हटाया जाना चाहिए।
जनसांख्यिकीय बदलाव का डर: स्थानीय जनजातियों को डर है कि अगर बाहरी लोगों की आमद नहीं रोकी गई, तो मूल निवासी अपने ही राज्य में अल्पसंख्यक बन जाएंगे। वे इसे अपनी संस्कृति और भविष्य के लिए एक बड़ा खतरा मानते हैं।
सरकार का रुख और कार्रवाई
राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन ने फिलहाल सख्त रवैया अपनाया है। जिला प्रशासन ने 9 दिसंबर के बंद को 'गैरकानूनी' घोषित किया था।
पुलिस कार्रवाई: बंद के दौरान शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस ने ईटानगर और नाहरलगुन से 30 से अधिक प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया।
चेकिंग अभियान: प्रशासन ने आश्वासन दिया है कि ILP की चेकिंग और सख्त की जाएगी। पुलिस ने हाल ही में कई जगहों पर छापेमारी कर बिना परमिट रह रहे मजदूरों और लोगों की पहचान की प्रक्रिया शुरू की है।
आगे की राह यह मुद्दा केवल कानून व्यवस्था का नहीं, बल्कि भावनाओं का बन चुका है प्रदर्शनकारी संगठनों ने चेतावनी दी है कि अगर सरकार ने उनकी मांगों विशेषकर अवैध बस्तियों को हटाने और घुसपैठियों को डिपोर्ट (Deport) करने पर जल्द कार्रवाई नहीं की, तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा उन्होंने "12 घंटे से 24 घंटे और फिर 36 घंटे के बंद" की चेतावनी दी है। अरुणाचल प्रदेश के लिए आने वाले कुछ महीने बेहद संवेदनशील हो सकते हैं, जहां सरकार को विकास कार्यों के साथ-साथ स्थानीय लोगों की पहचान की सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना होगा अरुणाचल प्रदेश में जारी विरोध को गहराई से समझने के लिए इन दोनों विषयों—इनर लाइन परमिट (ILP) और चकमा-हाजोंग शरणार्थी मुद्दे—को जानना बहुत जरूरी है। यहाँ इन दोनों के बारे में सरल और स्पष्ट जानकारी दी गई है:
1. इनर लाइन परमिट (ILP) क्या है?
यह अरुणाचल प्रदेश (और कुछ अन्य पूर्वोत्तर राज्यों) की सुरक्षा का सबसे बड़ा कानूनी कवच माना जाता है।
मूल कानून: इसकी शुरुआत अंग्रेजों के समय में 'बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर रेगुलेशन (BEFR), 1873' के तहत हुई थी।
नियम: इस नियम के अनुसार, कोई भी भारतीय नागरिक जो अरुणाचल प्रदेश का मूल निवासी नहीं है, वह बिना वैध परमिट (ILP) के राज्य की सीमा में प्रवेश नहीं कर सकता।
उद्देश्य: राज्य की आदिवासी (indigenous) आबादी की संस्कृति और पहचान को बाहरी प्रभाव से बचाना बाहरी लोगों को राज्य में जमीन खरीदने या बसने से रोकना।
वर्तमान विवाद: प्रदर्शनकारी छात्र संगठनों का आरोप है कि ILP प्रणाली में ढिलाई बरती जा रही है। बहुत से मजदूर और बाहरी लोग या तो नकली परमिट पर आ रहे हैं या परमिट की अवधि खत्म होने के बाद भी वापस नहीं जा रहे हैं। वे ILP चेकिंग को और सख्त करने और डिजिटल ट्रैकिंग की मांग कर रहे हैं।
2. चकमा-हाजोंग शरणार्थी विवाद
यह अरुणाचल प्रदेश का सबसे पुराना और संवेदनशील राजनीतिक मुद्दा है, जो अक्सर 'घुसपैठ' विरोधी आंदोलनों के केंद्र में रहता है।
कौन हैं ये लोग:
चकमा: ये बौद्ध धर्म को मानते हैं।
हाजोंग: ये हिंदू धर्म को मानते हैं।
इतिहास: ये लोग 1960 के दशक में तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से भारत आए थे। इनके विस्थापन का कारण वहां 'कप्ताई बांध' (Kaptai Dam) का निर्माण और धार्मिक उत्पीड़न था। भारत सरकार ने उन्हें उस समय के 'नेफा' (NEFA - अब अरुणाचल प्रदेश) के खाली इलाकों में बसाया था।
विवाद की जड़:
स्थानीय विरोध: अरुणाचल के मूल निवासी (जैसे AAPSU संगठन) इनका कड़ा विरोध करते हैं। उनका कहना है कि ये लोग 'विदेशी शरणार्थी' हैं, न कि भारतीय नागरिक। स्थानीय लोगों का मानना है कि इनकी बढ़ती जनसंख्या मूल आदिवासियों के संसाधनों और अधिकारों पर कब्जा कर रही है।
कानूनी लड़ाई: सुप्रीम कोर्ट ने कई बार चकमा-हाजोंग लोगों को भारतीय नागरिकता देने की बात कही है, लेकिन राज्य में इसका भारी विरोध होता रहा है।
वर्तमान स्थिति: स्थानीय संगठन मांग करते हैं कि इन्हें अरुणाचल प्रदेश से हटाकर देश के किसी अन्य हिस्से में बसाया जाए, जबकि शरणार्थी वहीं रहने और नागरिकता के अधिकारों की मांग करते हैं।
