हाल ही में (4-5 दिसंबर, 2025) नई दिल्ली में आयोजित 23वें भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन में कई महत्वपूर्ण फैसले लिए गए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच हुई इस बैठक ने दोनों देशों के रिश्तों को एक नई दिशा दी है। यहाँ उस बैठक के प्रमुख फैसलों और समझौतों पर एक विस्तृत लेख है
भारत-रूस शिखर सम्मेलन 2025 रणनीतिक साझेदारी का नया अध्याय नई दिल्ली में संपन्न हुए 23वें भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन ने यह साबित कर दिया है कि भू-राजनीतिक (Geopolitical) चुनौतियों के बावजूद दोनों देशों के रिश्ते बेहद मजबूत हैं। इस बैठक में रक्षा, व्यापार, ऊर्जा और कनेक्टिविटी को लेकर कई ऐतिहासिक फैसले लिए गए। यहाँ उन फैसलों का विस्तृत विश्लेषण दिया गया है
1. रक्षा क्षेत्र में ऐतिहासिक समझौता (RELOS Agreement) इस बैठक का सबसे बड़ा और चर्चित फैसला RELOS (Reciprocal Exchange of Logistics) समझौता है। यह क्या है? इस समझौते के तहत अब भारतीय और रूसी सेनाएँ एक-दूसरे के सैन्य ठिकानों, बंदरगाहों और रसद सुविधाओं (logistics) का उपयोग कर सकेंगी। फायदा इससे भारतीय नौसेना की पहुँच आर्कटिक क्षेत्र और उत्तरी ध्रुव तक बढ़ जाएगी, जो सामरिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। साथ ही, दोनों देशों ने भारत में ही रूसी हथियारों के संयुक्त उत्पादन (‘मेक इन इंडिया’ के तहत) को बढ़ावा देने पर भी सहमति जताई है। RELOS (Reciprocal Exchange of Logistics Agreement) भारत और रूस के बीच हुआ एक ऐसा समझौता है, जिसके भू-राजनीतिक (Geopolitical) मायने बहुत गहरे हैं। साधारण शब्दों में, यह समझौता दोनों देशों की सेनाओं को एक-दूसरे के सैन्य अड्डों पर ईंधन भरने, मरम्मत करने और राशन-पानी लेने की अनुमति देता है। चीन और अमेरिका के नजरिए से यह भारत के लिए क्यों ‘गेम-चेंजर’ है, इसे नीचे विस्तार से समझाया गया है
1. चीन के नजरिए से ‘ड्रैगन’ को कड़ा संदेश चीन के लिए यह समझौता चिंता का विषय हो सकता है क्योंकि यह भारत की रणनीतिक पहुँच को कई गुना बढ़ा देता है आर्कटिक क्षेत्र (Arctic Region) में भारत की एंट्री चीन खुद को ‘Near-Arctic State’ बताता है और वहां अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है। रूस के पास दुनिया का सबसे बड़ा आर्कटिक तट है। RELOS के जरिए भारतीय नौसेना अब रूस के आर्कटिक बंदरगाहों का इस्तेमाल कर सकेगी। इसका मतलब है कि भारत अब सिर्फ हिंद महासागर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उसकी मौजूदगी उत्तरी ध्रुव तक होगी, जहाँ चीन अपना दबदबा बनाना चाहता है। रूस-चीन गठबंधन पर ‘चेक’ दुनिया को डर था कि रूस पूरी तरह से चीन की गोद में जा रहा है। इस समझौते ने साबित कर दिया कि रूस अपनी विदेश नीति में स्वतंत्र है और वह चीन के दबाव में भारत को नहीं छोड़ेगा। भारत के लिए यह जरूरी है कि रूस, चीन का ‘जूनियर पार्टनर’ न बने। RELOS समझौता रूस को भारत के साथ मजबूती से जोड़े रखता है, जो चीन के लिए एक कूटनीतिक झटका है।
2. अमेरिका और पश्चिमी देशों के नजरिए से रणनीतिक स्वायत्तता’ (Strategic Autonomy) अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ भारत के रिश्ते अच्छे हैं, लेकिन यह समझौता उन्हें भी एक स्पष्ट संदेश देता है: संतुलन (Balance of Power): भारत ने अमेरिका के साथ पहले ही ऐसा ही एक समझौता (LEMOA) कर रखा है। रूस के साथ RELOS साइन करके भारत ने दुनिया को दिखा दिया कि वह किसी एक गुट (सिर्फ अमेरिका या सिर्फ रूस) का हिस्सा नहीं है। भारत अपनी शर्तों पर दोनों महाशक्तियों के साथ रिश्ते निभा सकता है। भरोसेमंद साथी अमेरिका यह चाहता था कि भारत रूस से दूरी बना ले। लेकिन इस समझौते ने साफ कर दिया कि भारत अपनी रक्षा जरूरतों और पुराने दोस्त (रूस) को दरकिनार नहीं करेगा, चाहे पश्चिम का कितना भी दबाव क्यों न हो।
3. भारत के लिए इसका सीधा फायदा (Operational Benefit) ब्लू वॉटर नेवी (Blue Water Navy): भारतीय नौसेना अब खुले समुद्र में ज्यादा दिनों तक टिक सकती है। अगर भारतीय जहाज रूस के पास किसी मिशन पर हैं, तो उन्हें ईंधन के लिए वापस भारत आने की जरूरत नहीं होगी; वे रूसी बंदरगाहों से ईंधन ले सकेंगे। युद्ध और शांति दोनों में उपयोगी: युद्ध की स्थिति में या फिर मानवीय सहायता (जैसे सुनामी या समुद्री बचाव कार्य) के दौरान यह लॉजिस्टिक्स सपोर्ट बहुत काम आता है।
2. व्यापार का बड़ा लक्ष्य: $100 बिलियन (2030 तक) दोनों नेताओं ने आर्थिक संबंधों को ऊर्जा और हथियारों से आगे ले जाने का फैसला किया है। नया लक्ष्य: साल 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 100 अरब डॉलर तक पहुँचाने का लक्ष्य रखा गया है।
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