रैगिंग की भेंट चढ़ी 19 वर्षीय छात्रा पल्लवी, शैक्षणिक संस्थानों की सुरक्षा पर उठे बड़े सवाल
By Aman Srivastava | Published: 03 January 2026 | Time: 07:00 AM
देश में रैगिंग और शैक्षणिक उत्पीड़न की घटनाएँ लगातार चिंता का विषय बनती जा रही हैं। ताज़ा मामला 19 वर्षीय छात्रा पल्लवी से जुड़ा है, जिसने कथित तौर पर प्रोफेसर और सहपाठियों द्वारा किए गए मानसिक उत्पीड़न से तंग आकर आत्महत्या कर ली। इस हृदयविदारक घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है।
लगातार उत्पीड़न का आरोप
परिजनों के अनुसार, पल्लवी पिछले कुछ समय से कॉलेज में हो रही रैगिंग और मानसिक प्रताड़ना को लेकर परेशान थी। उसने अपने परिवार को कई बार इस बारे में बताया था, लेकिन संस्थान प्रशासन की ओर से कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। आरोप है कि कुछ प्रोफेसर और सहपाठी उसके साथ दुर्व्यवहार करते थे, जिससे वह गहरे तनाव में चली गई।
प्रशासनिक लापरवाही पर सवाल
घटना के बाद शैक्षणिक संस्थान की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। यूजीसी और सुप्रीम कोर्ट के सख्त दिशा-निर्देशों के बावजूद रैगिंग जैसी घटनाओं का सामने आना, नियमों के कमजोर क्रियान्वयन को दर्शाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि केवल नियम बनाना ही नहीं, बल्कि उन्हें ज़मीनी स्तर पर लागू करना भी उतना ही ज़रूरी है।
जांच शुरू, कार्रवाई का आश्वासन
मामले की जानकारी मिलते ही स्थानीय पुलिस और प्रशासन ने जांच शुरू कर दी है। संबंधित प्रोफेसर और छात्रों से पूछताछ की जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो दोषियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
सोशल मीडिया पर आक्रोश
पल्लवी की मौत के बाद सोशल मीडिया पर लोगों का गुस्सा फूट पड़ा है। #JusticeForPallavi जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं। छात्र संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने दोषियों की गिरफ्तारी और पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने की मांग की है।
समाज के लिए चेतावनी
यह घटना सिर्फ एक छात्रा की मौत नहीं, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र के लिए एक गंभीर चेतावनी है। मानसिक स्वास्थ्य सहायता, मजबूत शिकायत निवारण प्रणाली और रैगिंग के प्रति शून्य सहनशीलता नीति को सख्ती से लागू करना अब समय की मांग बन चुका है।
पल्लवी भले ही अब हमारे बीच न हो,
लेकिन उसकी कहानी यह सवाल छोड़ जाती है —
क्या हमारे शैक्षणिक संस्थान वास्तव में सुरक्षित हैं?
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