कोणार्क सूर्य मंदिर पत्थर पर लिखी गई समय की कहानी
भारत के ओडिशा राज्य में पुरी के पास स्थित कोणार्क सूर्य मंदिर न केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि यह विज्ञान, खगोल शास्त्र और वास्तुकला का एक बेजोड़ संगम है। इसे 1984 में यूनेस्को (UNESCO) द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया था। इस मंदिर की भव्यता इतनी अधिक है कि रवींद्रनाथ टैगोर ने इसके लिए कहा था, "यहाँ पत्थर की भाषा मनुष्य की भाषा से भी श्रेष्ठ है।"
1. इतिहास और निर्माण (History and Construction)
- निर्माता: इस भव्य मंदिर का निर्माण 13वीं शताब्दी (लगभग 1250 ई.) में पूर्वी गंग वंश के राजा नरसिंहदेव प्रथम ने करवाया था।
- नाम का अर्थ: 'कोणार्क' शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है कोण (कोना/Angle) और अर्क (सूर्य)।
- ब्लैक पैगोडा (Black Pagoda): प्राचीन काल में यूरोपीय नाविक इसे ब्लैक पैगोडा कहते थे क्योंकि इसका ऊंचा काला टावर समुद्र से दिखता था और जहाजों को दिशा दिखाने में मदद करता था।
2. वास्तुकला: एक विशाल रथ (Architecture: A Colossal Chariot)
यह मंदिर कलिंग वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसे भगवान सूर्य के एक विशाल रथ के रूप में डिजाइन किया गया है।
- 7 घोड़े: मंदिर के सामने 7 पत्थर के घोड़े बने हैं (अब इनमें से कुछ क्षतिग्रस्त हो चुके हैं), जो सूर्य देव के रथ को खींच रहे हैं। ये 7 घोड़े सप्ताह के 7 दिनों का प्रतीक माने जाते हैं।
- 24 पहिये: मंदिर के आधार पर 12 जोड़ी (कुल 24) विशाल पत्थर के पहिये बने हैं।
- ये 24 पहिये दिन के 24 घंटों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
- कुछ मान्यताओं के अनुसार, 12 जोड़ी पहिये साल के 12 महीनों का प्रतीक भी हैं।
3. पत्थर की घड़ी का विज्ञान (The Sundial Mystery)
इस मंदिर के पहिये सिर्फ सजावट नहीं हैं, बल्कि ये सटीक धूपघड़ी (Sundial) का काम करते हैं।
- हर पहिये में 8 मोटी तीलियाँ (Spokes) हैं, जो दिन के 8 प्रहर (3-3 घंटे का समय) दर्शाती हैं।
- आज भी, यदि आप पहिये की धुरी की छाया को देखें, तो आप दिन का एकदम सटीक समय (मिनट तक) बता सकते हैं। यह प्राचीन भारत की उन्नत खगोल विज्ञान का प्रमाण है।
4. चुंबक का रहस्य (The Magnet Mystery)
कोणार्क मंदिर से जुड़ा सबसे बड़ा रहस्य इसके शिखर पर लगा विशाल चुंबक था।
- कहा जाता है कि मंदिर के निर्माण में पत्थरों के बीच लोहे की प्लेट्स का इस्तेमाल हुआ था और शिखर पर एक 52 टन का भारी चुंबकीय पत्थर (Lodestone) लगा था।
- यह चुंबक इतना शक्तिशाली था कि मुख्य सूर्य मूर्ति हवा में तैरती रहती थी (चुंबकीय प्रभाव के कारण)।
- विनाश की कहानी: किंवदंतियों के अनुसार, यह चुंबक समुद्र से गुजरने वाले जहाजों के कंपास (Compass) को खराब कर देता था, जिससे जहाज भटक जाते थे। इसलिए पुर्तगाली नाविकों ने उस चुंबक को निकालकर हटा दिया। चुंबक हटने से मंदिर का संतुलन बिगड़ गया और मुख्य ढांचा गिर गया।
5. मंदिर की वर्तमान स्थिति (Current Status)
आज हम जो मंदिर देखते हैं, वह वास्तव में मुख्य मंदिर का सिर्फ एक हिस्सा (जगमोहन या मंडप) है।
- मुख्य शिखर: जो मूल शिखर था, वह लगभग 229 फीट ऊंचा था, जो अब ध्वस्त हो चुका है।
- रेत से भरा मंदिर: अंग्रेजों के शासनकाल में (1903 में) जब यह मंडप भी गिरने की कगार पर था, तो गवर्नर जॉन वुडबर्न के आदेश पर इसे अंदर से पूरी तरह रेत और पत्थरों से भर दिया गया और सभी दरवाजे सील कर दिए गए ताकि यह सुरक्षित खड़ा रहे। यह आज भी उसी तरह बंद है।
6. सूर्य की तीन अवस्थाएं
मंदिर की दीवारों पर सूर्य देव की तीन अलग-अलग मूर्तियाँ स्थापित हैं, जो दिन के अलग-अलग समय को दर्शाती हैं:
- A. सुबह (उदित सूर्य): दक्षिण दिशा में, जो बचपन का प्रतीक है।
- B. दोपहर (मध्याह्न सूर्य): पश्चिम दिशा में, जो युवावस्था और ऊर्जा का प्रतीक है।
- C. शाम (अस्त होता सूर्य): उत्तर दिशा में, जो वृद्धावस्था और थकान का प्रतीक है।
7. कैसे पहुंचें? (Visitor Guide)
- स्थान: कोणार्क, पुरी जिले से लगभग 35 किमी और राजधानी भुवनेश्वर से 65 किमी दूर।
- नजदीकी एयरपोर्ट: बीजू पटनायक इंटरनेशनल एयरपोर्ट, भुवनेश्वर।
- नजदीकी रेलवे स्टेशन: पुरी रेलवे स्टेशन।
- घूमने का सबसे अच्छा समय: अक्टूबर से मार्च (सर्दियों में)।
- लाइट एंड साउंड शो: शाम के समय यहाँ एक शानदार लाइट एंड साउंड शो होता है, जो मंदिर का इतिहास बताता है।
कोणार्क का सूर्य मंदिर सिर्फ पत्थरों का ढेर नहीं है, बल्कि यह भारत के गौरवशाली अतीत, विज्ञान और कला का जीवित प्रमाण है। भले ही इसका मुख्य हिस्सा अब नहीं रहा, लेकिन इसके खंडहर भी इतने भव्य हैं कि ये दुनिया भर के पर्यटकों को अपनी ओर खींचते हैं।
